जीन पियाजे के अनुसार बच्चे संसार के साथ क्रिया करके ज्ञान का निर्माण करते हैं, और बढ़ती उम्र के साथ उनकी सोच केवल मात्रा में नहीं, गुणात्मक रूप से भी बदलती है। उन्होंने चार अवस्थाएँ बताईं, जिनसे हर बच्चा इसी क्रम में गुज़रता है, हालाँकि सबकी आयु बिल्कुल एक-सी नहीं होती।
संवेदी-गामक (जन्म से लगभग 2 वर्ष): बच्चा इंद्रियों और गतिविधियों से सीखता है; वस्तु-स्थायित्व विकसित होता है।
पूर्व-संक्रियात्मक (लगभग 2 से 7 वर्ष): भाषा और प्रतीकात्मक (कल्पनाशील) खेल बढ़ते हैं; सोच अहंकेंद्रित, एक ही पक्ष पर केंद्रित और अभी अनुत्क्रमणीय होती है, इसलिए संरक्षण की समझ नहीं होती।
मूर्त संक्रियात्मक (लगभग 7 से 11 वर्ष): ठोस वस्तुओं के बारे में तार्किक सोच — संरक्षण, उत्क्रमणीयता, वर्गीकरण और क्रमबद्धता।
औपचारिक संक्रियात्मक (लगभग 11 वर्ष से आगे): अमूर्त और परिकल्पनात्मक सोच; विचारों की क्रमबद्ध जाँच (परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक तर्क)।
कक्षा में इसका अर्थ है कि कार्य बच्चे के सोचने के ढंग के अनुसार हों: छोटे बच्चों के लिए मूर्त सामग्री और गतिविधि, और किशोरों के लिए परिकल्पना पर आधारित तर्क।