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बाल विकास सिद्धांत एक्सप्लोरर

बाल विकास पाठ्यक्रम के पाँच प्रमुख सिद्धान्त — पियाजे, कोहलबर्ग, वाइगोत्स्की, गार्डनर और ब्लूम — स्वयं खोजकर समझें, कक्षा में उनके उपयोग सहित।

जीन पियाजे के अनुसार बच्चे सक्रिय चिन्तक हैं, जो अपनी समझ का निर्माण स्वयं करते हैं। वे स्कीमा (मानसिक ढाँचे) बनाते हैं और उन्हें आत्मसात्करण (नए अनुभव को मौजूदा स्कीमा में शामिल करना) तथा समायोजन (नए अनुभव के अनुसार मौजूदा स्कीमा को बदलना या नया स्कीमा बनाना) द्वारा ढालते हैं; इन दोनों के बीच सन्तुलन बनाने की प्रक्रिया साम्यधारण (सन्तुलनीकरण) कहलाती है। उन्होंने संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ बताईं, जिनसे हर बच्चा इसी क्रम में गुज़रता है; आयु लगभग है और हर बच्चे में थोड़ी भिन्न हो सकती है। अवस्था देखने के लिए आयु बदलें।

संवेदी-गामक अवस्था 0–2 वर्ष

  • इन्द्रियों और शारीरिक क्रियाओं — देखना, छूना, मुँह में डालना, पकड़ना — के द्वारा संसार को जानता है।
  • रोचक परिणाम देने वाली क्रियाओं को बार-बार दोहराता है, जैसे झुनझुना बार-बार हिलाना (वृत्तीय प्रतिक्रियाएँ)।
  • वस्तु स्थायित्व का विकास: अवस्था के अन्त तक बच्चा समझ जाता है कि छिपाया गया खिलौना भी अस्तित्व में रहता है।
  • लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार आरम्भ होता है — जैसे कपड़े पर रखे खिलौने तक पहुँचने के लिए कपड़ा खींचना।
  • अन्त की ओर मानसिक छवियाँ बनाने लगता है और पहले देखी गई क्रिया की बाद में नकल कर पाता है (विलम्बित अनुकरण) — यहीं से प्रतीकात्मक चिन्तन की शुरुआत होती है।

कक्षा में: प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल में छूने, जमाने, हिलाने और खोजबीन के लिए सुरक्षित, विविध वस्तुएँ दें, और चेहरा या खिलौना छिपाकर फिर दिखाने जैसे खेल खिलाएँ — ये वस्तु स्थायित्व विकसित करते हैं।

पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था 2–7 वर्ष

  • प्रतीकात्मक चिन्तन: वस्तुओं के स्थान पर शब्दों, चित्रों और काल्पनिक खेल का प्रयोग करता है — डंडा घोड़ा बन जाता है (प्रतीकात्मक खेल)।
  • अहंकेन्द्रिता (आत्मकेन्द्रिता): दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से चीज़ों को देखने में कठिनाई होती है।
  • जीववाद: निर्जीव वस्तुओं को सजीव और भावनाओं वाला मानता है — ‘चाँद मेरे साथ चल रहा है’, ‘कुर्सी को चोट लग गई’।
  • केन्द्रीकरण: किसी स्थिति की एक प्रमुख विशेषता पर ही ध्यान देता है और बाकी को अनदेखा कर देता है।
  • अनुत्क्रमणीयता: किसी क्रिया को मन में उलटकर उसकी आरम्भिक स्थिति तक नहीं ले जा पाता।
  • संरक्षण का अभाव: चौड़े गिलास का पानी लम्बे-पतले गिलास में डालने पर उसे लगता है कि पानी बढ़ गया।

कक्षा में: खेल, कहानी, चित्र, अभिनय और वास्तविक वस्तुओं के माध्यम से सिखाएँ; व्याख्या छोटी और मूर्त रखें, और जब बच्चे अभी दूसरों का दृष्टिकोण न समझ पाएँ तो धैर्य रखें।

मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 7–11 वर्ष

  • संरक्षण: समझता है कि केवल आकार या व्यवस्था बदलने से संख्या, लम्बाई या मात्रा नहीं बदलती।
  • उत्क्रमणीयता: किसी क्रिया को मन में उलट सकता है — यदि 3 + 4 = 7, तो 7 − 4 = 3।
  • वर्गीकरण: वस्तुओं को एक या अधिक विशेषताओं के आधार पर समूहों में बाँटता है और समझता है कि एक बड़े वर्ग में छोटे वर्ग शामिल हो सकते हैं।
  • क्रमबद्धता: वस्तुओं को आकार, लम्बाई या भार के क्रम में लगा सकता है।
  • विकेन्द्रीकरण: किसी समस्या के कई पक्षों पर एक साथ विचार करता है, केवल एक पर नहीं।
  • तार्किक रूप से सोचता है, पर मुख्यतः मूर्त, वास्तविक वस्तुओं के बारे में; अमूर्त या काल्पनिक समस्याएँ अभी कठिन लगती हैं।

कक्षा में: हाथ से करने वाली सामग्री और जीवन से जुड़े उदाहरणों का प्रयोग करें — स्थानीय मान के लिए तीलियों के बण्डल, वास्तविक वस्तुओं की माप — और मूर्त से अमूर्त की ओर क्रमशः बढ़ें।

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था 11–वयस्क वर्ष

  • अमूर्त चिन्तन: न्याय, स्वतन्त्रता, चर और अनुपात जैसे विचारों पर मूर्त वस्तुओं के बिना तर्क कर सकता है।
  • परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक तर्क: परिकल्पना बनाता है और एक समय में एक ही कारक बदलकर उसकी क्रमबद्ध जाँच करता है।
  • केवल वास्तविक के बारे में नहीं, बल्कि सम्भावनाओं और ‘यदि ऐसा हो तो?’ वाली स्थितियों के बारे में भी सोचता है।
  • किसी तर्क की संरचना देखकर बता सकता है कि वह तार्किक है या नहीं, चाहे उसकी विषय-वस्तु काल्पनिक ही क्यों न हो।
  • सभी सम्भावित संयोजनों पर विचार करके समस्याओं को क्रमबद्ध ढंग से हल करता है।

कक्षा में: वाद-विवाद, मुक्त-उत्तरीय समस्याएँ, परियोजनाएँ और ऐसे प्रयोग कराएँ जिनमें विद्यार्थी स्वयं परिकल्पना बनाकर उसकी जाँच करें।

आधार: जे. पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त — जे. पियाजे एवं बी. इनहेल्डर, द साइकोलॉजी ऑफ़ द चाइल्ड (1969) · एल. कोहलबर्ग, शोध-प्रबन्ध, शिकागो विश्वविद्यालय (1958); ‘स्टेज एंड सीक्वेंस: द कॉग्निटिव-डेवलपमेंटल अप्रोच टू सोशलाइज़ेशन’ (1969) · एल. एस. वाइगोत्स्की, माइंड इन सोसाइटी (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1978); डी. वुड, जे. एस. ब्रूनर एवं जी. रॉस, ‘द रोल ऑफ़ ट्यूटरिंग इन प्रॉब्लम सॉल्विंग’ (1976) · एच. गार्डनर, फ़्रेम्स ऑफ़ माइंड: द थ्योरी ऑफ़ मल्टीपल इंटेलिजेंसेज़ (1983); इंटेलिजेंस रीफ़्रेम्ड (1999) · बी. एस. ब्लूम (सं.), टैक्सोनॉमी ऑफ़ एजुकेशनल ऑब्जेक्टिव्स, हैंडबुक I: कॉग्निटिव डोमेन (1956); एल. डब्ल्यू. एंडरसन एवं डी. आर. क्रैथवोल (सं.), अ टैक्सोनॉमी फ़ॉर लर्निंग, टीचिंग, एंड असेसिंग (2001) · एनसीईआरटी, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005; डी.एल.एड./बी.एड. के मानक बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र पाठ