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बाल विकास सिद्धांत एक्सप्लोरर
बाल विकास पाठ्यक्रम के पाँच प्रमुख सिद्धान्त — पियाजे, कोहलबर्ग, वाइगोत्स्की, गार्डनर और ब्लूम — स्वयं खोजकर समझें, कक्षा में उनके उपयोग सहित।
जीन पियाजे के अनुसार बच्चे सक्रिय चिन्तक हैं, जो अपनी समझ का निर्माण स्वयं करते हैं। वे स्कीमा (मानसिक ढाँचे) बनाते हैं और उन्हें आत्मसात्करण (नए अनुभव को मौजूदा स्कीमा में शामिल करना) तथा समायोजन (नए अनुभव के अनुसार मौजूदा स्कीमा को बदलना या नया स्कीमा बनाना) द्वारा ढालते हैं; इन दोनों के बीच सन्तुलन बनाने की प्रक्रिया साम्यधारण (सन्तुलनीकरण) कहलाती है। उन्होंने संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थाएँ बताईं, जिनसे हर बच्चा इसी क्रम में गुज़रता है; आयु लगभग है और हर बच्चे में थोड़ी भिन्न हो सकती है। अवस्था देखने के लिए आयु बदलें।
संवेदी-गामक अवस्थापूर्व-संक्रियात्मक अवस्थामूर्त संक्रियात्मक अवस्थाऔपचारिक संक्रियात्मक अवस्था
संवेदी-गामक अवस्था 0–2 वर्ष
इन्द्रियों और शारीरिक क्रियाओं — देखना, छूना, मुँह में डालना, पकड़ना — के द्वारा संसार को जानता है।
रोचक परिणाम देने वाली क्रियाओं को बार-बार दोहराता है, जैसे झुनझुना बार-बार हिलाना (वृत्तीय प्रतिक्रियाएँ)।
वस्तु स्थायित्व का विकास: अवस्था के अन्त तक बच्चा समझ जाता है कि छिपाया गया खिलौना भी अस्तित्व में रहता है।
लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार आरम्भ होता है — जैसे कपड़े पर रखे खिलौने तक पहुँचने के लिए कपड़ा खींचना।
अन्त की ओर मानसिक छवियाँ बनाने लगता है और पहले देखी गई क्रिया की बाद में नकल कर पाता है (विलम्बित अनुकरण) — यहीं से प्रतीकात्मक चिन्तन की शुरुआत होती है।
कक्षा में: प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल में छूने, जमाने, हिलाने और खोजबीन के लिए सुरक्षित, विविध वस्तुएँ दें, और चेहरा या खिलौना छिपाकर फिर दिखाने जैसे खेल खिलाएँ — ये वस्तु स्थायित्व विकसित करते हैं।
पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था 2–7 वर्ष
प्रतीकात्मक चिन्तन: वस्तुओं के स्थान पर शब्दों, चित्रों और काल्पनिक खेल का प्रयोग करता है — डंडा घोड़ा बन जाता है (प्रतीकात्मक खेल)।
अहंकेन्द्रिता (आत्मकेन्द्रिता): दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से चीज़ों को देखने में कठिनाई होती है।
जीववाद: निर्जीव वस्तुओं को सजीव और भावनाओं वाला मानता है — ‘चाँद मेरे साथ चल रहा है’, ‘कुर्सी को चोट लग गई’।
केन्द्रीकरण: किसी स्थिति की एक प्रमुख विशेषता पर ही ध्यान देता है और बाकी को अनदेखा कर देता है।
अनुत्क्रमणीयता: किसी क्रिया को मन में उलटकर उसकी आरम्भिक स्थिति तक नहीं ले जा पाता।
संरक्षण का अभाव: चौड़े गिलास का पानी लम्बे-पतले गिलास में डालने पर उसे लगता है कि पानी बढ़ गया।
कक्षा में: खेल, कहानी, चित्र, अभिनय और वास्तविक वस्तुओं के माध्यम से सिखाएँ; व्याख्या छोटी और मूर्त रखें, और जब बच्चे अभी दूसरों का दृष्टिकोण न समझ पाएँ तो धैर्य रखें।
मूर्त संक्रियात्मक अवस्था 7–11 वर्ष
संरक्षण: समझता है कि केवल आकार या व्यवस्था बदलने से संख्या, लम्बाई या मात्रा नहीं बदलती।
उत्क्रमणीयता: किसी क्रिया को मन में उलट सकता है — यदि 3 + 4 = 7, तो 7 − 4 = 3।
वर्गीकरण: वस्तुओं को एक या अधिक विशेषताओं के आधार पर समूहों में बाँटता है और समझता है कि एक बड़े वर्ग में छोटे वर्ग शामिल हो सकते हैं।
क्रमबद्धता: वस्तुओं को आकार, लम्बाई या भार के क्रम में लगा सकता है।
विकेन्द्रीकरण: किसी समस्या के कई पक्षों पर एक साथ विचार करता है, केवल एक पर नहीं।
तार्किक रूप से सोचता है, पर मुख्यतः मूर्त, वास्तविक वस्तुओं के बारे में; अमूर्त या काल्पनिक समस्याएँ अभी कठिन लगती हैं।
कक्षा में: हाथ से करने वाली सामग्री और जीवन से जुड़े उदाहरणों का प्रयोग करें — स्थानीय मान के लिए तीलियों के बण्डल, वास्तविक वस्तुओं की माप — और मूर्त से अमूर्त की ओर क्रमशः बढ़ें।
औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था 11–वयस्क वर्ष
अमूर्त चिन्तन: न्याय, स्वतन्त्रता, चर और अनुपात जैसे विचारों पर मूर्त वस्तुओं के बिना तर्क कर सकता है।
परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक तर्क: परिकल्पना बनाता है और एक समय में एक ही कारक बदलकर उसकी क्रमबद्ध जाँच करता है।
केवल वास्तविक के बारे में नहीं, बल्कि सम्भावनाओं और ‘यदि ऐसा हो तो?’ वाली स्थितियों के बारे में भी सोचता है।
किसी तर्क की संरचना देखकर बता सकता है कि वह तार्किक है या नहीं, चाहे उसकी विषय-वस्तु काल्पनिक ही क्यों न हो।
सभी सम्भावित संयोजनों पर विचार करके समस्याओं को क्रमबद्ध ढंग से हल करता है।
कक्षा में: वाद-विवाद, मुक्त-उत्तरीय समस्याएँ, परियोजनाएँ और ऐसे प्रयोग कराएँ जिनमें विद्यार्थी स्वयं परिकल्पना बनाकर उसकी जाँच करें।
लॉरेंस कोहलबर्ग ने नैतिक दुविधाएँ प्रस्तुत करके अध्ययन किया कि लोग सही और गलत के बारे में कैसे तर्क करते हैं। अवस्था का पता निर्णय से नहीं, बल्कि उसके पीछे दिए गए तर्क से चलता है। उन्होंने तीन स्तर बताए, प्रत्येक में दो अवस्थाएँ, जो एक निश्चित क्रम में आती हैं: अधिकांश छोटे बच्चे पूर्व-पारम्परिक स्तर पर, अधिकांश किशोर और वयस्क पारम्परिक स्तर पर तर्क करते हैं, जबकि उत्तर-पारम्परिक स्तर तक कम लोग पहुँचते हैं। नीचे के सभी उदाहरण एक ही दुविधा के उत्तर हैं — कबीर को विद्यालय के खेल के मैदान में एक बटुआ मिलता है, जिसमें ₹500 और पुस्तकालय का कार्ड है। उसे उठाते हुए किसी ने नहीं देखा। क्या उसे बटुआ रख लेना चाहिए या जमा करा देना चाहिए? कक्षा में ऐसी रोज़मर्रा की दुविधाओं पर चर्चा करना और ‘क्यों?’ पूछना नैतिक विकास में सहायक होता है।
उत्तर-पारम्परिक (उत्तर-परम्परागत) स्तर
6 सार्वभौमिक नैतिक सिद्धान्त अभिविन्यास
सही-गलत का निर्णय न्याय, समानता और मानवीय गरिमा जैसे स्व-चयनित सिद्धान्तों से होता है, जो सब पर लागू होते हैं। जब कोई कानून इन सिद्धान्तों से टकराए, तो सिद्धान्त को प्राथमिकता दी जाती है। कोहलबर्ग ने पाया कि यह अवस्था बहुत कम लोगों में दिखती है।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “भले कोई नियम न होता और किसी को कभी पता न चलता, इसे रख लेना मालिक के साथ अन्याय होगा। मैं चाहूँगा कि मेरी जगह जो भी हो, वह इसे लौटाए — इसलिए मुझे भी यही करना चाहिए।”
5 सामाजिक अनुबन्ध (समझौता) अभिविन्यास
कानूनों को ऐसे समझौते माना जाता है जो लोगों ने सबके हित और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के लिए किए हैं। उनका सम्मान होना चाहिए, पर जब वे लोगों के कल्याण में सहायक न रहें, तो सहमति से उन्हें बदला जा सकता है।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “खोई हुई चीज़ों से जुड़े नियम इसलिए हैं क्योंकि हम सबने माना है कि हर व्यक्ति के सामान की रक्षा होनी चाहिए। इस पैसे पर मालिक का अधिकार है, और इस समझौते को निभाने में हम सबकी भलाई है।”
पारम्परिक (परम्परागत) स्तर
4 कानून एवं व्यवस्था अभिविन्यास (सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना)
अपना कर्तव्य निभाना, अधिकार का सम्मान करना और नियमों व कानूनों का पालन करना ही सही है, क्योंकि यदि सब उनकी अनदेखी करें तो समाज की व्यवस्था टूट जाएगी।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “विद्यालय का नियम है कि मिली हुई चीज़ें कार्यालय में जमा हों। अगर हर कोई मिली चीज़ रख ले, तो किसी का सामान सुरक्षित नहीं रहेगा।”
जो दूसरों को प्रसन्न करे या उनकी मदद करे और उनकी स्वीकृति दिलाए, वही सही है। एक अच्छे व्यक्ति — दयालु, वफ़ादार, भरोसेमन्द — के रूप में देखा जाना सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, और इरादों का महत्त्व समझ में आने लगता है।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “मैं इसे जमा करा दूँगा। मेरे माता-पिता और शिक्षकों को मुझ पर गर्व होगा, और सबको पता चलेगा कि मैं ईमानदार हूँ।”
पूर्व-पारम्परिक (पूर्व-परम्परागत) स्तर
2 व्यक्तिवाद एवं विनिमय (स्व-हित) अभिविन्यास
जो अपने हित में हो, वही सही है। दूसरों का ध्यान केवल लेन-देन के रूप में रखा जाता है — ‘तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी करूँगा’। बच्चा समझने लगता है कि अलग-अलग लोगों के हित अलग-अलग होते हैं।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “अगर मालिक मुझे इनाम दे, तो मैं लौटा दूँगा। वरना मैं क्यों परेशान होऊँ? रख लूँ तो ₹500 मेरे।”
1 दण्ड एवं आज्ञापालन अभिविन्यास
किसी कार्य को उसके भौतिक परिणामों से आँका जाता है: जिस पर दण्ड मिले, वह गलत है। नियमों का पालन दण्ड से बचने के लिए किया जाता है, और अधिकार रखने वालों की बात केवल इसलिए मानी जाती है क्योंकि उनके पास शक्ति है।
इस अवस्था का बच्चा कह सकता है: “मुझे बटुआ जमा करा देना चाहिए। अगर किसी शिक्षक को पता चल गया कि मैंने इसे रख लिया, तो मुझे सज़ा मिलेगी।”
नीचे की सीढ़ी से ऊपर पढ़ें: हर अवस्था अपने नीचे वाली पर टिकी है।
लेव वाइगोत्स्की के अनुसार बच्चा पहले दूसरों — माता-पिता, शिक्षकों, साथियों — के साथ अन्तःक्रिया करके सीखता है और फिर उस सीख को आत्मसात् करके अपना बना लेता है। उनके मत में अच्छा शिक्षण विकास से थोड़ा आगे चलता है। हर क्षेत्र का अर्थ जानने के लिए वृत्त पर टैप करें; सभी उदाहरण कक्षा 2 की एक ही बच्ची, निशा, के हैं।
स्वयं कर सकता है — वास्तविक विकास स्तर
वे कार्य जिन्हें बच्चा बिना किसी सहायता के पूरा कर लेता है। यह स्तर उस विकास को दर्शाता है जो हो चुका है, और अधिकतर परीक्षाएँ इसी को मापती हैं।
उदाहरण: निशा बिना हासिल वाले दो अंकों के जोड़, जैसे 23 + 14, स्वयं कर लेती है।
सहायता से कर सकता है — समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)
बच्चा स्वयं जो कर सकता है और किसी वयस्क या अधिक सक्षम साथी के मार्गदर्शन से जो कर सकता है, उनके बीच की दूरी। शिक्षण यहीं सबसे प्रभावी होता है; जैसे-जैसे बच्चा स्वयं नियन्त्रण लेता है, सहायता धीरे-धीरे कम की जाती है।
उदाहरण: दस-दस तीलियों के बण्डलों और शिक्षिका के संकेत — ‘पहले इकाइयाँ जोड़ो। क्या दस या उससे अधिक हुईं?’ — की सहायता से निशा 27 + 15 हल कर लेती है, जिसमें हासिल लगता है।
अभी पहुँच से बाहर
वे कार्य जो सहायता मिलने पर भी अभी बहुत आगे के हैं। इन्हें अभी थोपने से निराशा या रटकर नकल ही होती है; समीपस्थ विकास के क्षेत्र वाले कार्यों में दक्षता आने के बाद ये पहुँच में आ जाते हैं।
उदाहरण: चार अंकों की संख्या को दो अंकों की संख्या से भाग देना अभी सहायता के साथ भी निशा की पहुँच से बाहर है।
मुख्य शब्द
पाड़ (पाड़ बाँधना)
समीपस्थ विकास के क्षेत्र (ZPD) में दी जाने वाली अस्थायी सहायता — संकेत, प्रश्न, प्रदर्शन, कार्य को छोटे चरणों में बाँटना — जिसे अधिगमकर्ता के आत्मनिर्भर होने के साथ धीरे-धीरे हटा लिया जाता है, जैसे भवन के खड़ा हो जाने पर पाड़ हटा दी जाती है। यह शब्द वुड, ब्रूनर और रॉस (1976) ने इसी प्रकार की सहायता के लिए प्रस्तुत किया था; वाइगोत्स्की ने स्वयं यह शब्द प्रयोग नहीं किया, पर यह उनके ZPD के विचार से जुड़ा है।
अधिक जानकार अन्य (MKO)
कोई भी व्यक्ति जो किसी विशेष कार्य को अधिगमकर्ता से बेहतर समझता हो — शिक्षक, अभिभावक, बड़ा बच्चा या उस कौशल में आगे कोई सहपाठी। उसका वयस्क होना आवश्यक नहीं है।
निजी वाक्
किसी कार्य को करते समय बच्चों का स्वयं से ज़ोर से बोलना। वाइगोत्स्की ने इसे अपने चिन्तन और क्रियाओं को दिशा देने का साधन माना; आयु के साथ यह मौन आन्तरिक वाक् में बदल जाती है। पियाजे ने इसी बोलने को अहंकेन्द्रिता का लक्षण (अहंकेन्द्रित वाक्) माना था।
सामाजिक अन्तःक्रिया
उच्च मानसिक क्षमताएँ पहले लोगों के बीच (सामाजिक स्तर पर) प्रकट होती हैं और बाद में बच्चे के भीतर (व्यक्तिगत स्तर पर)। इसलिए चर्चा, समूह-कार्य और दूसरों से बातचीत संज्ञानात्मक विकास को आगे बढ़ाते हैं।
भाषा और चिन्तन
भाषा संस्कृति द्वारा दिया गया चिन्तन का सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण है। चिन्तन और वाणी अलग-अलग जड़ों से विकसित होते हैं और लगभग दो वर्ष की आयु में आपस में मिल जाते हैं; इसके बाद भाषा चिन्तन को आकार देती है। इसके विपरीत पियाजे का मत था कि पहले चिन्तन विकसित होता है और भाषा उसे प्रतिबिम्बित करती है।
हॉवर्ड गार्डनर (फ़्रेम्स ऑफ़ माइंड, 1983) के अनुसार बुद्धि कोई एक सामान्य योग्यता नहीं है जिसे एक बुद्धि-लब्धि (IQ) अंक में मापा जा सके, बल्कि यह कई अपेक्षाकृत स्वतन्त्र बुद्धियों का समूह है। 1983 में उन्होंने सात बुद्धियाँ बताईं और 1990 के दशक में आठवीं, प्रकृतिवादी बुद्धि, जोड़ी। हर बच्चे में सभी बुद्धियाँ अलग-अलग मात्रा में होती हैं — इसलिए किसी अवधारणा को कई तरीकों से पढ़ाएँ, और किसी बच्चे पर एक ही बुद्धि का ठप्पा न लगाएँ।
भाषायी बुद्धि
शब्दों, उनकी ध्वनियों और अर्थों के प्रति संवेदनशीलता; पढ़ने, लिखने, बोलने और कहानी सुनाने में कुशलता।
कक्षा में: किसी पाठ को कहानी के रूप में दोबारा सुनाना, या नदी की ओर से उसे प्रदूषित करने वालों के नाम पत्र लिखना।
तार्किक-गणितीय बुद्धि
तर्क करना, प्रतिरूप (पैटर्न) पहचानना, संख्याओं के साथ काम करना और कारण-परिणाम को समझना।
कक्षा में: किसी संख्या-प्रतिरूप का नियम खोजकर अगला पद बताना, या यह जाँचने के लिए निष्पक्ष प्रयोग की योजना बनाना कि कौन-सा कागज़ सबसे अधिक पानी सोखता है।
स्थानिक (दृश्य-स्थानिक) बुद्धि
चित्रों में सोचना; आकृतियों, स्थान, मानचित्रों और दिशाओं की मन में कल्पना करना।
कक्षा में: घर से विद्यालय तक के रास्ते का मानचित्र बनाना, या किसी अध्याय को अवधारणा-मानचित्र में बदलना।
शारीरिक-गतिसंवेदी बुद्धि
शरीर का कुशलता से उपयोग और वस्तुओं को नियन्त्रण के साथ सँभालना — जैसे खेल, नृत्य, अभिनय और शिल्प में।
कक्षा में: जल-चक्र को अभिनय द्वारा प्रस्तुत करना, या मिट्टी से किसी भू-आकृति का मॉडल बनाना।
संगीतात्मक बुद्धि
लय, सुर, धुन और स्वर के प्रति संवेदनशीलता; संगीत के प्रतिरूप रचने और याद रखने की क्षमता।
कक्षा में: ग्रहों का क्रम या कोई पहाड़ा याद रखने के लिए गीत या ताल बनाना।
अन्तर्वैयक्तिक (पारस्परिक) बुद्धि
दूसरे लोगों की भावनाओं, इरादों और मनोदशा को समझना तथा उनके साथ मिलकर अच्छी तरह काम करना।
कक्षा में: निर्धारित भूमिकाओं के साथ समूह-परियोजना करना, या सहपाठी-शिक्षण द्वारा किसी साथी की मदद करना।
अन्तःवैयक्तिक (आत्म-बोध) बुद्धि
स्वयं को समझना — अपनी भावनाएँ, क्षमताएँ, कमज़ोरियाँ और लक्ष्य — और इस समझ से अपने कार्यों को दिशा देना।
कक्षा में: अधिगम-डायरी रखना: आज मुझे क्या आसान या कठिन लगा, क्यों, और अगले सप्ताह के लिए मेरा लक्ष्य क्या है।
प्रकृतिवादी बुद्धि
पौधों, जन्तुओं और प्रकृति की अन्य विशेषताओं को पहचानना और वर्गीकृत करना; पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता।
कक्षा में: विद्यालय के बगीचे से गिरी हुई पत्तियाँ इकट्ठी करके उन्हें आकार, किनारे और शिरा-विन्यास के आधार पर छाँटना।
बेंजामिन ब्लूम का वर्गीकरण (1956) संज्ञानात्मक उद्देश्यों को सरल से जटिल क्रम में व्यवस्थित करता है। एंडरसन और क्रैथवोल ने 2001 में इसे संशोधित किया: श्रेणियों के नाम संज्ञा से क्रिया में बदले गए, ‘ज्ञान’ को ‘स्मरण करना’ और ‘बोध’ को ‘समझना’ कहा गया, तथा ‘संश्लेषण’ ‘सृजन करना’ बनकर ‘मूल्यांकन करना’ के ऊपर, सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। क्रियापद और उदाहरण-प्रश्न देखने के लिए किसी स्तर पर टैप करें — सभी प्रश्न एक ही विषय, ‘जल’, पर हैं।
1. स्मरण करना
स्मृति से तथ्यों और मूलभूत जानकारी को पहचानना या याद करना।
अर्थ ग्रहण करना: किसी विचार को अपने शब्दों में समझाना, उसकी व्याख्या करना, सारांश देना या उसके उदाहरण देना।
समझानावर्णन करनासारांश देनाव्याख्या करनाअपने शब्दों में कहनाउदाहरण देना
नमूना प्रश्न: वाष्पीकरण क्या है, अपने शब्दों में समझाइए और अपने घर से इसका एक उदाहरण दीजिए।
3. अनुप्रयोग करना
सीखे हुए नियम, विधि या विचार का प्रयोग किसी नई स्थिति में कार्य करने या समस्या हल करने के लिए करना।
प्रयोग करनाहल करनागणना करनाप्रदर्शित करनालागू करनाक्रियान्वित करना
नमूना प्रश्न: एक टपकता नल हर 10 मिनट में 250 मिलीलीटर का कप भर देता है। वह एक घंटे में कितना पानी बर्बाद करता है?
4. विश्लेषण करना
जानकारी को भागों में बाँटना और यह पता लगाना कि वे भाग आपस में और पूरे से कैसे जुड़े हैं — कारण, प्रतिरूप और अन्तर खोजना।
विश्लेषण करनाअन्तर करनाभेद करनाव्यवस्थित करनापरीक्षण करनाछानबीन करना
नमूना प्रश्न: यह तालिका दिखाती है कि आपके विद्यालय में पानी का हर उपयोग एक दिन में कितने लीटर लेता है और वास्तव में कितने लीटर की ज़रूरत है। किस उपयोग में सबसे अधिक पानी बर्बाद होता है, और उसका कारण क्या है?
5. मूल्यांकन करना
मानदण्डों या प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेना और उसका औचित्य सिद्ध करना।
निर्णय करनाऔचित्य सिद्ध करनाआँकनासमालोचना करनापक्ष का बचाव करनासंस्तुति करना
नमूना प्रश्न: आपके विद्यालय में पानी बचाने के दो सुझाव हैं: सभी टपकते नलों की मरम्मत, या ‘जल बचाओ’ के पोस्टर लगाना। किससे अधिक पानी बचेगा? अपने उत्तर का औचित्य बताइए।
6. सृजन करना
विभिन्न तत्वों को जोड़कर कुछ नया रचना — योजना, डिज़ाइन, कहानी, मॉडल या समाधान।
डिज़ाइन करनासृजन करनारचना करनायोजना बनानानिर्माण करनाआविष्कार करना
नमूना प्रश्न: विद्यालय में पानी की बर्बादी कम करने के लिए अपनी कक्षा की एक सप्ताह की योजना बनाइए, जिसमें हर समूह की भूमिका तय हो।
आधार:
जे. पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धान्त — जे. पियाजे एवं बी. इनहेल्डर, द साइकोलॉजी ऑफ़ द चाइल्ड (1969) · एल. कोहलबर्ग, शोध-प्रबन्ध, शिकागो विश्वविद्यालय (1958); ‘स्टेज एंड सीक्वेंस: द कॉग्निटिव-डेवलपमेंटल अप्रोच टू सोशलाइज़ेशन’ (1969) · एल. एस. वाइगोत्स्की, माइंड इन सोसाइटी (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1978); डी. वुड, जे. एस. ब्रूनर एवं जी. रॉस, ‘द रोल ऑफ़ ट्यूटरिंग इन प्रॉब्लम सॉल्विंग’ (1976) · एच. गार्डनर, फ़्रेम्स ऑफ़ माइंड: द थ्योरी ऑफ़ मल्टीपल इंटेलिजेंसेज़ (1983); इंटेलिजेंस रीफ़्रेम्ड (1999) · बी. एस. ब्लूम (सं.), टैक्सोनॉमी ऑफ़ एजुकेशनल ऑब्जेक्टिव्स, हैंडबुक I: कॉग्निटिव डोमेन (1956); एल. डब्ल्यू. एंडरसन एवं डी. आर. क्रैथवोल (सं.), अ टैक्सोनॉमी फ़ॉर लर्निंग, टीचिंग, एंड असेसिंग (2001) · एनसीईआरटी, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005; डी.एल.एड./बी.एड. के मानक बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र पाठ