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संधि और समास विच्छेदक
कोई शब्द चुनिए, उसका संधि-विच्छेद या समास-विग्रह और उसके पीछे का नियम देखिए, फिर खुद को परखिए।
दो वर्णों (ध्वनियों) के मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं। संधि वाले शब्द को फिर से उसके मूल भागों में अलग करना संधि-विच्छेद है। कोई शब्द चुनिए और उसका विच्छेद व नियम देखिए; अभ्यास मोड में पहले खुद विच्छेद सोचिए, फिर उत्तर खोलिए।
विद्यालय = विद्या + आलय
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
हिमालय = हिम + आलय
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
अ + आ = आ। 'हिमा + लय' लिखना आम गलती है।
गिरीश = गिरि + ईश
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
रवींद्र = रवि + इंद्र
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
भानूदय = भानु + उदय
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
वधूत्सव = वधू + उत्सव
दीर्घ स्वर संधि दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
महेश = महा + ईश
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
नरेंद्र = नर + इंद्र
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
सूर्योदय = सूर्य + उदय
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
महोत्सव = महा + उत्सव
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
महर्षि = महा + ऋषि
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
आ + ऋ = अर्। यह र् रेफ के रूप में 'षि' के ऊपर लगता है, इसलिए कई विद्यार्थी इसे गुण संधि नहीं पहचान पाते।
देवर्षि = देव + ऋषि
गुण संधि अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
सदैव = सदा + एव
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
एकैक = एक + एक
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
मतैक्य = मत + ऐक्य
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
महैश्वर्य = महा + ऐश्वर्य
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
जलौघ = जल + ओघ
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
परमौषध = परम + औषध
वृद्धि संधि अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
इत्यादि = इति + आदि
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
यद्यपि = यदि + अपि
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
प्रत्येक = प्रति + एक
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
स्वागत = सु + आगत
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
उ + आ असमान स्वर हैं, इसलिए उ → व् (यण)। इसे दीर्घ संधि न समझें।
अन्वेषण = अनु + एषण
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
पित्राज्ञा = पितृ + आज्ञा
यण संधि इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
ऋ + असमान स्वर में ऋ → र्, इसलिए पितृ + आज्ञा → पित् + र् + आज्ञा = पित्राज्ञा।
नयन = ने + अन
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
देखने में साधारण शब्द लगता है, पर ए + अ → अय् होकर न् + अय् + अन = नयन बनता है।
गायक = गै + अक
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
पवन = पो + अन
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
पवित्र = पो + इत्र
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
ओ → अव्, फिर व् + इ = वि: प् + अव् + इत्र = पवित्र।
पावक = पौ + अक
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
नाविक = नौ + इक
अयादि संधि ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
जगदीश = जगत् + ईश
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
दिग्गज = दिक् + गज
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
जगन्नाथ = जगत् + नाथ
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
सज्जन = सत् + जन
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
उल्लास = उत् + लास
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
संतोष = सम् + तोष
व्यंजन संधि व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
म् के बाद त आया, इसलिए म् अनुस्वार (ं) बन गया। 'सन्तोष' वर्तनी भी सही है।
निश्चल = निः + चल
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
मनोबल = मनः + बल
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
अः + घोष व्यंजन ब = ओ। यह विसर्ग संधि है, गुण नहीं; 'मन + ओबल' जैसा कोई विच्छेद नहीं होता।
दुर्जन = दुः + जन
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
नमस्ते = नमः + ते
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
निष्फल = निः + फल
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
नीरस = निः + रस
विसर्ग संधि विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
ः + र में विसर्ग का लोप होता है और इ दीर्घ होकर ई बन जाता है। 'नि + रस' लिखना गलत है।
नियम
- दीर्घ स्वर संधि
- दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर, चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ, मिलकर एक दीर्घ स्वर बन जाते हैं: अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ।
- गुण संधि
- अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ और ऋ आए तो अर् बनता है: अ/आ + इ/ई = ए; अ/आ + उ/ऊ = ओ; अ/आ + ऋ = अर्।
- वृद्धि संधि
- अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ और ओ/औ आए तो औ बनता है: अ/आ + ए/ऐ = ऐ; अ/आ + ओ/औ = औ।
- यण संधि
- इ/ई, उ/ऊ या ऋ के बाद कोई असमान (भिन्न) स्वर आए तो वे अर्धस्वर में बदल जाते हैं: इ/ई + असमान स्वर = य्; उ/ऊ + असमान स्वर = व्; ऋ + असमान स्वर = र्।
- अयादि संधि
- ए, ऐ, ओ या औ के बाद कोई भी स्वर आए तो: ए → अय्; ऐ → आय्; ओ → अव्; औ → आव्।
- व्यंजन संधि
- व्यंजन का स्वर या दूसरे व्यंजन से मेल होने पर व्यंजन में परिवर्तन होता है। मुख्य नियम: वर्ग का पहला वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) + स्वर, किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण या य, र, व = उसी वर्ग का तीसरा वर्ण (ग्, ज्, ड्, द्, ब्); पहला वर्ण + न/म = उसी वर्ग का पाँचवाँ (नासिक्य) वर्ण; त् + च/ज/ल = च्च/ज्ज/ल्ल; म् + क से म तक का कोई वर्ण = अनुस्वार (ं) या उसी वर्ग का पंचम वर्ण।
- विसर्ग संधि
- विसर्ग (ः) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में परिवर्तन होता है: अः + घोष व्यंजन = ओ; इः/उः + स्वर या घोष व्यंजन = र्; ः + च/छ = श्; ः + त/थ = स्; इः/उः + क/प/फ = ष्; इः/उः + र = विसर्ग का लोप और इ/उ दीर्घ (ई/ऊ) हो जाता है (निः + रस = नीरस) — यह इः/उः + घोष = र् का अपवाद है; अः + र में ओ ही बनता है (मनः + रथ = मनोरथ)।
दो या अधिक पदों को मिलाकर बने नए छोटे शब्द को समस्त पद कहते हैं, और उसे फिर से खोलकर लिखना समास-विग्रह है। संधि में वर्णों का मेल होता है, समास में पदों (शब्दों) का। प्रकार पहचानने का सबसे तेज़ तरीका है यह देखना कि कौन-सा पद प्रधान है। कोई शब्द चुनिए और उसका विग्रह व समास देखिए।
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
प्रतिदिन = प्रत्येक दिन
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
आजीवन = जीवन भर
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
भरपेट = पेट भरकर
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
आमरण = मरण तक
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
यथासमय = समय के अनुसार
अव्ययीभाव समास पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
राजपुत्र = राजा का पुत्र
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
रेखांकित = रेखा से अंकित
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
करण तत्पुरुष: यहाँ 'से' का अर्थ 'के द्वारा' (साधन) है। देशनिकाला में यही 'से' अलग होने (अपादान) का अर्थ देता है, इसलिए केवल चिह्न नहीं, अर्थ देखिए।
रसोईघर = रसोई के लिए घर
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
देशनिकाला = देश से निकाला
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
अपादान तत्पुरुष: यहाँ 'से' अलग होने (देश से बाहर किए जाने) का अर्थ देता है, साधन का नहीं।
घुड़सवार = घोड़े पर सवार
तत्पुरुष समास उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
नीलकमल = नीला है जो कमल
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
महापुरुष = महान है जो पुरुष
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
परमेश्वर = परम है जो ईश्वर
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
अधमरा = आधा है जो मरा
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
चरणकमल = कमल के समान चरण
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
विद्याधन = विद्या रूपी धन
कर्मधारय समास उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
चौराहा = चार राहों का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
सप्ताह = सात दिनों का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
नवरात्र = नौ रात्रियों का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
शताब्दी = सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
पंचतंत्र = पाँच तंत्रों का समूह
द्विगु समास पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
माता-पिता = माता और पिता
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
राम-लक्ष्मण = राम और लक्ष्मण
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
दाल-रोटी = दाल और रोटी
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
नर-नारी = नर और नारी
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
भला-बुरा = भला या बुरा
द्वंद्व समास दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
जब दोनों में से एक का भाव हो तो विग्रह में 'और' की जगह 'या' आता है; दोनों पद प्रधान हैं, इसलिए यह भी द्वंद्व ही है।
दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
यह संख्या से शुरू होता है, पर द्विगु नहीं है: यह किसी समूह का नहीं, एक विशेष व्यक्ति (रावण) का बोध कराता है।
गजानन = गज का आनन है जिसका अर्थात् गणेश
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
चक्रपाणि = चक्र है पाणि में जिसके अर्थात् विष्णु
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
चंद्रशेखर = चंद्र है शेखर (मस्तक) पर जिसके अर्थात् शिव
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
वीणापाणि = वीणा है पाणि में जिसके अर्थात् सरस्वती
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
हंसवाहिनी = हंस है वाहन जिसका अर्थात् सरस्वती
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
नीलकंठ = नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
इस शब्द के दो अर्थ हैं। कर्मधारय: 'नीला है जो कंठ' (केवल नीला गला)। बहुव्रीहि: 'नीला है कंठ जिसका अर्थात् शिव'। विग्रह में 'जो' आए और अर्थ कंठ का ही रहे तो कर्मधारय; 'जिसका' आए और संकेत किसी तीसरे (शिव) की ओर हो तो बहुव्रीहि। उत्तर देने से पहले प्रश्न में दिया विग्रह या संदर्भ देखिए।
पीतांबर = पीला है अंबर (वस्त्र) जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण
बहुव्रीहि समास कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।
इस शब्द के दो अर्थ हैं। कर्मधारय: 'पीला है जो अंबर' (केवल पीला वस्त्र)। बहुव्रीहि: 'पीला है अंबर जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण' (पीला वस्त्र धारण करने वाले)। प्रश्न में दिए विग्रह या संदर्भ से निर्णय कीजिए।
नियम
- अव्ययीभाव समास
- पहला पद प्रधान होता है और प्रायः अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर…) होता है। पूरा समस्त पद अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करता है और लिंग-वचन से नहीं बदलता। विग्रह: यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
- तत्पुरुष समास
- उत्तर पद (दूसरा पद) प्रधान होता है। विग्रह में बीच का लुप्त कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से (अलग होना), का/के/की, में/पर) लौट आता है: राजपुत्र = राजा का पुत्र। कर्मधारय और द्विगु मूल रूप से तत्पुरुष के ही भेद हैं, पर परीक्षाओं में इन्हें अलग गिना जाता है।
- कर्मधारय समास
- उत्तर पद प्रधान होता है। दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विग्रह: नीलकमल = नीला है जो कमल; चरणकमल = कमल के समान चरण।
- द्विगु समास
- पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है; उत्तर पद प्रधान होता है। विग्रह: त्रिभुवन = तीन भुवनों का समूह। संख्या वाला पद यदि किसी विशेष व्यक्ति का नाम बताए (दशानन = रावण), तो वह बहुव्रीहि है।
- द्वंद्व समास
- दोनों पद प्रधान होते हैं। विग्रह में 'और', 'या' या 'अथवा' जुड़ता है और समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न (-) लगता है। विग्रह: माता-पिता = माता और पिता।
- बहुव्रीहि समास
- कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। विग्रह में प्रायः 'जिसका / जिसके / जिसकी' (कभी-कभी जो, जिसने, जिसमें) आता है और बताया जाता है कि कौन अभिप्रेत है: दशानन = दस हैं आनन जिसके अर्थात् रावण।